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: मैं अब भी हूं तुम्हारी, तुम महसूस तो करो - संजय परसाई 'सरल'

admin

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Tue, Mar 7, 2023
मैं अब भी हूं तुम्हारी, तुम महसूस तो करो - संजय परसाई 'सरल'

किताबों की तह में रखे
पुराने ख़त
बहुत कुछ याद दिलाते

अलमारी के पट खुलते ही
खुल जाते यादों के पिटारे
हिलोरे लेने लगती
यादों की लताएँ

ख़तों के बीच रखे
सूखे गुलाब
बरबस बयां कर देते
अपनी दास्तां

होंठ खुले बिना
सब कह जाते

चूर चूर होती
सूख चुकी पत्तियां
यादों की ताज़गी का
कराती अहसास

लगता/ जैसे
ख़त रखी किताब की तरह
अभी भी हाथों में है
वो गुलाब सी महकती
ज़ुल्फों वाला
चाँद सा चमकता चेहरा

और/चेहरे पर
गुलों के मकरंद सी
सजी बिंदियाँ
मानों कह रही हो
मैं अब भी हूं तुम्हारी
तुम महसूस तो करो।

संजय परसाई'सरल' रतलाम(मप्र)

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