: मां की ममता का कोई किनारा नहीं - प्रीति बर्वे बड़ोले
मां की ममता
वह सागर है
जिसका कोई किनारा नहीं,
ममता की
प्रतिमा से सुंदर ,
कोई और
नजारा नहीं,
जो सुकुन छिपा है
उसके आंचल में ,
उससे बढ़कर ,
कोई सहारा नहीं,
कितनी गहराई है,
फ़िक्र में उसकी,
उस क्षितिज के आगे ,
कोई तारा नही,
कितनी करूणा है
हृदय में उसके ,
नयनों से निहारा
जाता नहीं।
जिस तरह पुकारते हैं
मां को,
किसी और को
पुकारा जाता नहीं,
बचा लेती है ,
दुनिया की बुरी
नजरों से,
उतार कर
क्षण भर में नजर,
न कोई वैद्य,
ना चिकित्सक,
उसके आगे
कोई विकल्प नहीं।
आरंभ जिससे,
सारे जगत का संज्ञान,
करते बारंबार
देवता जिन्हें प्रणाम,
लालायित जिसके
स्नेह को स्वयं
करूणा निधान,
नतमस्तक जिसके
आगे इस रचना
को रचने वाले
रचना कार,
उस मां के लिए मेरे शब्द कोष में शब्द नहीं।
प्रीति बर्वे बडोले - इंदौर

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