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: काश: मेरी भी एक बेटी होती - अनिता गौतम

काश: मेरी भी एक बेटी होती - अनिता गौतम

हृदय की न जाने ये कैसी विडंबना है, प्रत्येक क्षण सत्य होते हुए भी न जाने लगता क्यों सपना है? फिर भी दिल के किसी कोने से यह आवाज है आती, कि काश:! मेरी भी एक बेटी होती, जिसमें में अपना बचपन स्मरण कर पाती जैसे मैं अपने माता-पिता की दुलारी हूं शायद वह भी मेरी प्यारी होती, परछाई में देखती अपनी छवि को सजाती और संवारती जैसे कि आसमान में नन्ही परी होती, यूँ तो दिल को समझाने को दुनिया की हर बेटी मेरी बेटी है पर सपने कहां अपने होते हैं आंख खुलते ही सामने से ओझल हो जाते हैं, जो सुख तो क्षण भर देते हैं पर दुख: असीमित दे जाते हैं, पर ना जाने क्यों समाज की यह असहनीय दुर्दशा देखकर शरीर मृत शिथल हो जाता है, जब आँखों के समक्ष एक बेटी का अस्तित्व ही माँ की कोख में मिटा दिया जाता है, तब सहसा हृदय में एक सवाल विचरण कर जाता है कि काश: तू अगर कहीं भगवान है तो क्यों तमाशबीन बने यह सब देखता है, क्यों नहीं तू अपनी इच्छाधारी शक्ति का परिचय देता, जिससे पनपते हैं असुर और देवता, क्यों कुछ हैवान इस धरा पर उपज जाते हैं जो एक ही क्षण में किसी के घर की लाज का अस्तित्व ही मिटा जाते हैं, चंद क्षणो की हवस मैं क्यों वह यह सब भूल जाते हैं, कि हमने जिस का हनन किया वह भी किसी की बहन और बेटी है, हम बात करते हैं वंश रुपी उस इमारत की जिसकी नीव में लगी वह पहली ईंट तो बेटी है, बेटी शब्द से क्यों आज ये समाज अनभिज्ञ व अनजान है, क्योंकि बेटी ने ही जन्मे ब्रह्मा, विष्णु, महेश और रुद्र जैसे भगवान है।

अंत में मैं यह सब अनदेखा कर देती हूँ कि काश: मेरी भी एक बेटी होती......
अनिता गौतम
आगरा, उत्तरप्रदेश

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